Sunday, 25 January 2015
Friday, 9 January 2015
भगवान !
भगवान मेरे घर के दालान में
रोज़ मिट्टी खेलता है !
अपनी छोटी सी साइकिल से
धरती के चक्कर लगाता है !
हर दिन आसमान रंगता है ...
नया मौसम बनता है !
सूरज बनकर जागता है
चाँद बनकर सोता है !
फूल की तरह हंसता है
बारिश की तरह रोता है !
फुदक-फुदक कर जमीन से
अम्बर छूने की कोशिश करता है !
तितलियों के पीछे दौड़ता है
गिलहरी के जैसे बिस्किट कुतरता है !
बात-बात पर मचलता है,रूठता है,
कनखियों से देखता है फिर मान जाता है !
अपनी नन्ही-नन्हीं उँगलियों पर
ज़िन्दगी की गणित बिठाता है भगवान !
रोज़ मिट्टी खेलता है !
अपनी छोटी सी साइकिल से
धरती के चक्कर लगाता है !
हर दिन आसमान रंगता है ...
नया मौसम बनता है !
सूरज बनकर जागता है
चाँद बनकर सोता है !
फूल की तरह हंसता है
बारिश की तरह रोता है !
फुदक-फुदक कर जमीन से
अम्बर छूने की कोशिश करता है !
तितलियों के पीछे दौड़ता है
गिलहरी के जैसे बिस्किट कुतरता है !
बात-बात पर मचलता है,रूठता है,
कनखियों से देखता है फिर मान जाता है !
अपनी नन्ही-नन्हीं उँगलियों पर
ज़िन्दगी की गणित बिठाता है भगवान !
Wednesday, 7 January 2015
वक्त !
वो वक्त था
जो कभी
मेरे पैरों से
जमीं ले गया
वही वक्त ...
देखो आज
सर से मेरे
आसमान भी ले गया !
जो कभी
मेरे पैरों से
जमीं ले गया
वही वक्त ...
देखो आज
सर से मेरे
आसमान भी ले गया !
ग़म ज़रा सा !
आँख के जज़ीरे पे हमने रखा था
चख़ा हुआ पुराना कोई ग़म ज़रा सा !
एक हिचकी याद की ऐसी आई
के छलक के गिर गया शबनम ज़रा सा !
अश्क़ों का दिल से भला रिश्ता क्या है ?
हर ताज़े ज़ख्म पे मरहम ज़रा सा !
ऐसी गरीब हो गई आँखें इन दिनों
के नहीं झरता आंसुओं का मौसम ज़रा सा !
चख़ा हुआ पुराना कोई ग़म ज़रा सा !
एक हिचकी याद की ऐसी आई
के छलक के गिर गया शबनम ज़रा सा !
अश्क़ों का दिल से भला रिश्ता क्या है ?
हर ताज़े ज़ख्म पे मरहम ज़रा सा !
ऐसी गरीब हो गई आँखें इन दिनों
के नहीं झरता आंसुओं का मौसम ज़रा सा !
Tuesday, 6 January 2015
संवेदना के चलते..
बहुत आसन था
तुम्हारा मुझमे घटना
और हमेशा के लिए जुड़ जाना
मगर तुम घटना नहीं चाहते
जुड़ते ही घुटन होती है
तुम्हारी स्वछन्दता को
बस तुम्हारी इसी संवेदना के चलते
मै घटती हूँ तुममें हर क्षण !
Wednesday, 18 June 2014
तुम्हरी गली में..वो नाजुक सी लड़की !
याद् है मुझे तुम्हारी गली में वो
नाजुक सी लड़की ..
सहमती लरजती जरा सी लजीली
नजर झुकाती-मिलाती फिर ठहर जाती
फुदकती गिलहरी कोई पेड़ पे जैसे
आम की बौरों पे कोयल सी कूकती !
याद है मुझे वो
तुम दोनों का लड़कपन
लड़ना-झगड़ना, रूठना-मनाना
दिनभर सताते रातों को जगाते
एक दूसरे में डूबे जैसे
इसी जहाँ में हों किसी और जहाँ के !
याद है मुझे वो
तुम्हारी आख्रिरी लड़ाई
जैसे मादक शाम में घुली हो
रात की स्याह तन्हाई
जैसे दिनरात के साथ को
किसी ने हो नजर लगाई !
आज भी वो नाजुक सी लड़की
किसी कुण्डी सी है खटखटाती
आज भी तुम्हारे दिल के दरवाजे
कितने मजबूत से हैं..
आज भी तुम किसी सख्त
शीशम के किवाड़ से हो बंद !
याद है मुझे...
आज भी वो
तुम्हारी गली की
नाजुक सी लड़की !
नाजुक सी लड़की ..
सहमती लरजती जरा सी लजीली
नजर झुकाती-मिलाती फिर ठहर जाती
फुदकती गिलहरी कोई पेड़ पे जैसे
आम की बौरों पे कोयल सी कूकती !
याद है मुझे वो
तुम दोनों का लड़कपन
लड़ना-झगड़ना, रूठना-मनाना
दिनभर सताते रातों को जगाते
एक दूसरे में डूबे जैसे
इसी जहाँ में हों किसी और जहाँ के !
याद है मुझे वो
तुम्हारी आख्रिरी लड़ाई
जैसे मादक शाम में घुली हो
रात की स्याह तन्हाई
जैसे दिनरात के साथ को
किसी ने हो नजर लगाई !
आज भी वो नाजुक सी लड़की
किसी कुण्डी सी है खटखटाती
आज भी तुम्हारे दिल के दरवाजे
कितने मजबूत से हैं..
आज भी तुम किसी सख्त
शीशम के किवाड़ से हो बंद !
याद है मुझे...
आज भी वो
तुम्हारी गली की
नाजुक सी लड़की !
Monday, 26 May 2014
जमा खर्च !
जमा खर्च !
बीती रात जेब खाली थी
मगर आँख खुलते ही
जेब टटोला तो
हर बार की तरह
फिर एक दिन निकला
खर्च करता रहा जिस्म
उसे जहन के इशारे पे !
दोपहर के उतरने
और शाम के आने से पहले
दिल ने शाम के हिस्सों पे दावेदारी की
समझौतों पे बात कुछ ठहरी तो
मगर झुकी शाम खर्च हुई
फिर तुम्हारे इंतज़ार में !
दिल डूब गया जिस्म के किसी कोने में
रात बिना ना-नुकुर वक्त के हाथों गुजर गई
और फिर एक कीमती सा दिन
लम्हों में टूटकर हमेशा के लिए
खनकते हुए सिक्कों सा खर्च हो गया !
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