Sunday, 27 October 2013

मौसम बदल रहा है ::::::


ये कहता है मुझसे बादल
देखो ! मौसम बदल रहा है.
भोर है ओस से नहाई
शबनम मोती सा पल रहा है.
उत्तर से दक्षिण को चल रहा है
सूरज अपनी रंगत बदल रहा है.
आसमाँ की नीली गोद में
सुबह संतरी शाम सा मचल रहा है.
जेठ दुपहरी थक गयी है
कार्तिक जाड़ों में ढल रहा है.
गर्मियों की सांझ बीती  
रुत पुराना चोला बदल रहा है.
काली घनेरी रातों में
चाँद तन्हा ठिठुर रहा है .
हाँ ! सच कहता है ये बादल
मौसम फिर से बदल रहा है l

Thursday, 17 October 2013

और जिन्दगी बहती रही.......

शाम ढलते यूँ नज़ारा था जमीनों-आसमां के बीच 
चाँद उकडूं बैठा था तनहा रात की छत पे
सितारे झपकियाँ ले रहे थे आसमाँ की गोद में
झील ख़ामोशी से बैठी थी पहाड़ियों के बीच
हवाएं गुफ्तगू करती रही चनारों से जाने क्या
समन्दर देह से नमक उतार चांदनी में नहाता रहा
मकान खड़े-खड़े उंघते रहे सड़कों के किनारे
रास्ते हर ओर से दौड़ते रहे मंजिलों की ओर
और जिन्दगी बहती रही हर रोज की तरह !

Monday, 23 September 2013

चनाब बहती रही.....रोज की तरह ...


   चनाब बहती रही  रोज की तरह..
अपने दो जुदा-जुदा किनारों के साथ
उसके किनारे तो नहीं मिले कभी..
पर मिलते देखा उसने उन दोनों को..
एक मिर्जा ! जो आया परदेस से..खोजने अपना यार..
एक हीर ! जो कच्चे मिटटी के घड़ों में भर ले जाती सांचा प्यार
और चनाब बहती रही रोज की तरह..
उसी की मिटटी ,उसी का पानी...उससे ही बनते घड़े
पर बनाते दो सजीले सुघढ़ हाथ.. हीर के
और रांझा चराता भेंडे चनाब के किनारे
और चनाब बहती रही रोज की तरह..
उसके पानी में पाँव डाले बिताये जाने कितने दिन
उसके पानी में देखा दोनों ने चाँद जाने कितनी रातें 
उसके पानी ने देखा दो अक्स कभी दूर तो कभी पास
और चनाब बहती रही रोज की तरह..
उसके मीठे पानी से धोये खारे आंसूं दोनों ने
उसके मीठे पानी को हाथ में ले उठाई 
सौगंध जुदा न होने की दोनों ने..
और चनाब बहती रही रोज की तरह..
रात अंधेरी कच्चे घड़े के सहारे पार जाना था उसे..
मिटटी खो गयी मिटटी में...सब रंग पानी हो गया
हीर खो गयी रांझे में,दोनों चनाब हो गए..
फिर चनाब बहती रही रोज की तरह !