Monday, 22 July 2013

कागज़ सींचा मैने....

अपने मन की रोशनाई से
आँखों की बिनाई से
कुछ हल्के-भारी शब्दों से
कागज़ सींचा मैंने !
कुछ चेहरे गुजरे झूठे-सच्चे से
कुछ सिमटे से कुछ बिखरे से
उतरते-चढ़ते उन भावों से
कागज़ सींचा मैंने !
खुद को भी देखा कुछ दूरी से
फिर देखा अंतर्मन से
उन उलझे-सुलझे खयालों से
कागज़ सींचा मैंने !
बिन जाने के फल क्या होगा
आज फलेगा या बरसों बाद हवा देगा
नन्हीं आशाओं के फूलों से
कागज़ सींचा मैंने !