Wednesday, 20 November 2013

न कुछ कहते..........न सुनते ..

  सर्दियों में शाल में लिपटे हुए दोनों
   कहीं दूर क्षितिज की ओर देखते हुए..
   एक-दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
   गर्म कॉफ़ी को घूंट-घूंट भरते हुए
   जैसे एक प्याले में ही दो जोड़ी होंठ
   अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हुए !
 


 
 

    


 नर्म दूब पे लेटे हुए गुनगुनी धूप के साथ
 मौसम की खुशबू को साँसों में भरते हुए 

 एक दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
 आँचल का इक टुकड़ा आँखों पे रखे हुए
 जैसे एक ही छाँव में दो जोड़ी आँखें
 अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हुए !

            
 
 
 

 
 
 पहाड़ी की ढलान पे साथ चलते-चलते
 बहकती पवन के झोके के साथ मुड़ते हुए
 एक-दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
 कभी हाथ मिलते हुए कभी छूटते हुए
 जैसे एक-दूजे के साथ में दो जोड़ी हाथ
 अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हए..


 


   सर्द बर्फीली रात में चाँद के साथ
   अलाव की ताप जिस्म में भरते हुए
   एक दूसरे न कुछ कहते न सुनते
   अपनी-अपनी आंच से दूर बैठे हुए
   जैसे एक जोड़ी बदन दो आत्माओं के साथ
   अपने अपने हिस्से का प्यार जीते हुए..