Wednesday, 20 November 2013

न कुछ कहते..........न सुनते ..

  सर्दियों में शाल में लिपटे हुए दोनों
   कहीं दूर क्षितिज की ओर देखते हुए..
   एक-दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
   गर्म कॉफ़ी को घूंट-घूंट भरते हुए
   जैसे एक प्याले में ही दो जोड़ी होंठ
   अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हुए !
 


 
 

    


 नर्म दूब पे लेटे हुए गुनगुनी धूप के साथ
 मौसम की खुशबू को साँसों में भरते हुए 

 एक दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
 आँचल का इक टुकड़ा आँखों पे रखे हुए
 जैसे एक ही छाँव में दो जोड़ी आँखें
 अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हुए !

            
 
 
 

 
 
 पहाड़ी की ढलान पे साथ चलते-चलते
 बहकती पवन के झोके के साथ मुड़ते हुए
 एक-दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
 कभी हाथ मिलते हुए कभी छूटते हुए
 जैसे एक-दूजे के साथ में दो जोड़ी हाथ
 अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हए..


 


   सर्द बर्फीली रात में चाँद के साथ
   अलाव की ताप जिस्म में भरते हुए
   एक दूसरे न कुछ कहते न सुनते
   अपनी-अपनी आंच से दूर बैठे हुए
   जैसे एक जोड़ी बदन दो आत्माओं के साथ
   अपने अपने हिस्से का प्यार जीते हुए..

Monday, 18 November 2013

जुगनुओं ने संभाली थी रौशनी !


रात ! जुगनुओं ने संभाली थी रौशनी

अँधेरा ! घना था ,घना काजलों की तरह

काज़ल ! किनारे कहीं पोर से उठता हुआ

बढ़ता हुआ जैसे,.... जैसे पीर की तरह

चुपचाप अंतर्मन में फैलता गहरा धुआं

धुआं ! आँखों में चुभता-जलता  हुआ

के अचानक खिलखिला के वो हंस पड़ी

जैसे किसी मासूम बच्चे की सलोनी हंसी

न जाने कितने जुगनू चमके उस एक क्षण में

आँखों ने मल कर धोया दुःख का धुआं

पीर पिघलती गयी गर्म मोम की तरह

काज़ल सिमट कर बन गया बस एक आंसू

अँधेरा घना था, ..घना दूर तक फैला हुआ

पर मुस्कुराते जुगनुओं ने संभाली रौशनी !        

Sunday, 27 October 2013

मौसम बदल रहा है ::::::


ये कहता है मुझसे बादल
देखो ! मौसम बदल रहा है.
भोर है ओस से नहाई
शबनम मोती सा पल रहा है.
उत्तर से दक्षिण को चल रहा है
सूरज अपनी रंगत बदल रहा है.
आसमाँ की नीली गोद में
सुबह संतरी शाम सा मचल रहा है.
जेठ दुपहरी थक गयी है
कार्तिक जाड़ों में ढल रहा है.
गर्मियों की सांझ बीती  
रुत पुराना चोला बदल रहा है.
काली घनेरी रातों में
चाँद तन्हा ठिठुर रहा है .
हाँ ! सच कहता है ये बादल
मौसम फिर से बदल रहा है l

Thursday, 17 October 2013

और जिन्दगी बहती रही.......

शाम ढलते यूँ नज़ारा था जमीनों-आसमां के बीच 
चाँद उकडूं बैठा था तनहा रात की छत पे
सितारे झपकियाँ ले रहे थे आसमाँ की गोद में
झील ख़ामोशी से बैठी थी पहाड़ियों के बीच
हवाएं गुफ्तगू करती रही चनारों से जाने क्या
समन्दर देह से नमक उतार चांदनी में नहाता रहा
मकान खड़े-खड़े उंघते रहे सड़कों के किनारे
रास्ते हर ओर से दौड़ते रहे मंजिलों की ओर
और जिन्दगी बहती रही हर रोज की तरह !