सर्दियों में शाल में लिपटे हुए दोनों कहीं दूर क्षितिज की ओर देखते हुए..
एक-दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
गर्म कॉफ़ी को घूंट-घूंट भरते हुए
जैसे एक प्याले में ही दो जोड़ी होंठ
अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हुए !
नर्म दूब पे लेटे हुए गुनगुनी धूप के साथ
मौसम की खुशबू को साँसों में भरते हुए
एक दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
आँचल का इक टुकड़ा आँखों पे रखे हुए
जैसे एक ही छाँव में दो जोड़ी आँखें
अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हुए !
पहाड़ी की ढलान पे साथ चलते-चलते
बहकती पवन के झोके के साथ मुड़ते हुए
एक-दूसरे से न कुछ कहते न सुनते
कभी हाथ मिलते हुए कभी छूटते हुए
जैसे एक-दूजे के साथ में दो जोड़ी हाथ
अपने-अपने हिस्से का प्यार जीते हए..
सर्द बर्फीली रात में चाँद के साथ
अलाव की ताप जिस्म में भरते हुए
एक दूसरे न कुछ कहते न सुनते
अपनी-अपनी आंच से दूर बैठे हुए
जैसे एक जोड़ी बदन दो आत्माओं के साथ
अपने अपने हिस्से का प्यार जीते हुए..





