Friday, 9 August 2013

ईद मुबारक !

eid mubarak !
जुम्मे के रोज..उस दिन अलविदा की नमाज के बाद...वक्त गुजर रहा था खरामा-खरामा....खैर-ख्वाह लोग गुजर रहे थे भीड़नुमा शक्ल में...उसी पल थी वो दुआओं में तुम्हारे चिश्ती की दरगाह पे चढ़ायी थी उसने कुछ जूही और गुलाब से गुंथी हुई फूलों की अपनी घनी पलकों में तुम्हारा चेहरा छुपाये हुए..उसने माँगा था तुम्हे उम्रभर के लिए..
फिर लौट पड़ी घर की ओर..माथा टेकने के बाद..इस उम्मीद से के अगली बार दोनों साथ आयेंगे..
कुछ रोज ही गुजरे थे..के इंतजार था सबको..चाँद का...और उसे इंतज़ार था..अपने चाँद की खबर का...अचानक शोर सा हुआ..लोग ख़ुशी से कह रहे थे...चाँद मुबारक ! चाँद मुबारक !....पर उसे खबर नहीं मिली अपने चाँद की.........अगले रोज..ईद के मुबारक के मौके पे...तिरंगे में लिपटा हुआ.. कारवां के साथ कोई आया पड़ोस के चौखट पे...उसने दुमंजिले के छज्जे से देखा..और उसकी नब्ज रुक सी गयी...बेतहाशा भागती सी पहुंची जब वहां...और किसी ने जब चेहरे से तिरंगा हटाया...तो वही चेहरा था वहां जो उसके आँखों में बसा था....
चीखो-पुकार, शोरो-गुल..हाय-तौबा के माहौल में..उसकी ख़ामोशी घुट गयी...पत्थर सी आँखे..पीछे लौटते से कदम ....ढला हुआ दुपट्टा....बिखरा वजूद..और जाने के वाले की गूंजती सी आवाज उसके कानो में....जाने दे मुझे ! मै लौटूंगा....अरे पगली मै गुजरा वक्त नहीं के लौट के ना आ सकूँ..! के लौट के ना आ सकूँ ! लौट के ...??