Thursday, 1 August 2013

दास्ताँ !

ये अँधेरे उजले-उजले से ..
ये स्याह-स्याह सी रौशनी ..
ये बुझा-बुझा सा चराग है 
या मेरे दिल का नूर कोई ! 

ये उतरा-उतरा चाँद का चेहरा..
या खिला जमीं पे आफ़ताब है ..
ये मुरझाई कोई शाख है ..
या मैं रात सी झुक गयी !

वो जो मैंने कभी कहा नहीं ..

पर तूने जो सब सूना तो था..
वो दबी-घुटी सी बात क्या ..
ज़माने में मोहब्बतों सी बयां हुई !