Saturday, 14 September 2013

नहीं साबित कर पाया मैं !

                         

                         

 
 
 
 
 
 
 
 


नहीं..साबित कर पाया मै.......तुम सबके प्रति अपने प्रेम को..
जन्म देने वाले माता-पिता को..अपने खून के संबंधों को..
अपने जीवन- साथी को.......यहाँ तक की अपने जने बच्चो को भी....
नहीं साबित..कर पाया मैं....क्या करता...
कोई सुबूत ही नहीं था...मेरी मूक भावनाओ के लिए...
कैसे साबित करता मैं.....के कब-कहाँ- कहाँ मेरी प्रार्थनाओं में तुम थे..
मैंने हर उन टोटकों का सहारा लिया..जिससे तुम्हारा जीवन सुरक्षित रहे..
फिर भी नहीं साबित कर पाया मैं...

''
मानवीय भूलों से बना मैं..इन देवत्व पुरुषों को ..
इस नश्वर संसार में कुछ भी नहीं साबित कर पाया मैं.''

गलतफह्मियाँ !






जुम्मा-जुम्मा 4 दिन ही हुए थे..उन दोनों के मिले..हँसते खिलखिलाते...एक -दुसरे से झगड़ते.....
इतनी पाकीज़ा मुहब्बत के क्या कहूँ.... नजरों से ही छुआ था दोनों ने एक -दुसरे को....वो ज़रा जल्दी में रहती थी....और वो आराम से...मैंने पूछा..इत्ती जल्दी में क्यूँ रहती है..तू...वो हंसी..और बोली...चाहती हूँ के जल्दी-जल्दी जी लू इन पलों को....कहीं...ख़त्म न हो जाएँ...और चली गयी...वो कहते थे के वो १ जैसे हैं...थे भी १ जैसे....जैसे किसी चीज़ के २ टुकड़े..बिलकुल १ से..
                  
तो चार दिन ही हुए थे मिले उनको....और परसों ही उसने अपनी सारी जिन्दगी उसके नाम वसीयत कर दी.....वो कुछ खिली-खिली सी थी......और कल अचानक उसने उसे अपनी जिदगी से बेदखल कर दिया.......वो अवाक खड़ी देखती रही...और मन ही मन सोचती रही..के मैं इतनी तेज़ी से कभी नहीं चली..जितनी जल्दी.तुम मोड़..मुड़ गए..अचानक ही...बस..किसी की बात पर..क्यूँ...उसे देख कर.....मैं भी सोचती रही क्यूँ...शायद..जो बेलें.. तेज़ी से बढती है..सूखती भी जल्दी हैं........
                   
वो जा चुका था भारी क़दमों से...नम आँखों के साथ...और वो वहीँ बिखरी रही.....मैंने उसे समेटने की कोशिश की..पर वो उतनी भारी थी.जैसे रूह के बिना जिस्म...एक लाश...जिसे चार कंधो..पे ही उठाया जा सके....आँखे सुर्ख जर्द चेहरा...लरजते होठ...कांपता जिस्म...उसने कुछ कहा नहीं मुंह से पर आँखों से बोली के चली जाओ यहाँ से...मैं हट गयी उससे दूर....जानती हूँ उसे......अपने अकेलेपन में किसी को बर्दाश्त नहीं करती वो.........मैं दूर बैठी सोचती रही के किसकी नजर लग गयी इनको....
मैंने देखा था पहली बार..दोनों को इतना झगड़ते..दोनों लगातार बहस कर रहे..थे..बोले जा रहे थे...पता नहीं दोनों सुन भी रहे थे के नहीं..और शायद सुन ही रहे हों पर आज लफ्जो का एहसास मर चूका..था...उनके प्यार की यही तो खासियत थी..वो जिस्म का प्यार नहीं..लफ्जों का प्यार था....वो शब्द जो एक -दुसरे से कहते उसे महसूस करते थे....सुनने और महसूस करने में फर्क है...सुनना के बस अपने नजरिये से तुम्हारी बातें जानना..और महसूस करना....जैसे के उसकी बातें उसके नजरिये से भी सुनना....मगर आज वो एक-दुसरे की नजर से महसूस करना ..भूल गए......
अगले दिन....दिखी मुझे..बेजान सी...जैसे खुद को ही ढो के कहीं पहुंचा रही हो....उसने नम कागज का एक टुकड़ा थमाया और चली गयी....मैंने..घबराते हुए...खोला उसे.....देख के लगा जैसे कांपते हाथों से लिखा था उसने...स्याही....आंसुओं के चलते इतनी बिखरी हुई.के हर्फ़ दर हर्फ़ जोड़ के पढना मुश्किल हो रहा था.....पढ़ा मैंने.......
दो गुनाह थे उसके..एक तो खूबसूरत थी और..हंस के बातें करती थी सबसे........अपनी मासूम निगाहों से मासूम ही जाना उसने सबको......कभी मन में छल नहीं..दुराव नहीं छिपाव नहीं........तो उसके मन में कुछ नहीं पर लोग ! लोगों का क्या.........क्या वो भी मासूम बन जाए उसके जैसे और क्यूँ बने भई ????
उससे कोई दुआ-बन्दिगी भी कर के आता तो यूँ बताता के जैसे कई रोज बातें की हो उससे.....और उस पगली को तो खबर भी नहीं होती के वो खुद एक खबर है...उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ....के जिसे..वो निगाहों से सजदे करती थी..उसके किसी जाननेवाले से बात कर ली....और न जाने उसने क्या....मंतर फूंका......के वो बर्दाश्त न कर सका.........और बिफर पड़ा उस पर........मगर कहा न..वो कह रहे थे..सुन रहे थे..पर महसूस नहीं कर रहे थे.......बहस ने गलत मोड़ ले लिया...उसने कहा तुम्हे जाना है तो जाओ मैं रोकती नहीं जाते-जाते उसने कहा---सोच लो.......मुझे कतार में खड़े रहना पसंद नहीं .........वो बिलखते हुए भागी उसके पीछे के रुक जाओ..............पर जाने क्या सोच के पलट आई कुछ बुदबुदाती सी.............क्या...??.........कतार......कतार.......लाइन.......पंक्ति.......किसकी कतार......किस कतार मे खड़ा था वो........ओह !! विधाता......ये क्यूँ सोचा तुमने....उसने कहा तो कहा.....तुमने क्यूँ दिल में बिठा लिया......आगे उसने लिखा.......

के आज मैं अपनी ही नजरों में गिर गई,,,,,,,मैंने तुम्हारे लफ्जों से ही तो प्यार जाना था....तुमने कहा के प्यार करते हो तो महसूस किया के करते हो....तुमने कहा के तुम अच्छी हो..तुम्हारी नज़रों से देखा के अच्छी हूँ.....और हर लफ्ज़ महसूस किया जो भी तुम्हारे होठों से सुना.......तुम्हारे इस लफ्ज़ ने मुझे बाज़ार में ला पटका ...ये किसकी कतार है जिसमे तुम खड़े हो......मेरे मह्बुबों ..की आशिको की....चाहनेवालो की.....आज इसकी बारी कल तुम आना नहीं-नहीं-------मैं ऐसी नहीं......ऐसा क्यूँ कह डाला तुमने फिर......तुम जानते तो हो के तुम्हारे सिवा...कोई नहीं यहाँ ......फिर भी तुम्हारी गलती नहीं.......कुछ मेरा ही दोष होगा.....हो सके तो लौट आना......
आज जाना के क्यूँ जल्दी में रहती थी वो इतनी....जानती हूँ के वो भी...उससे अलग होके जिन्दा नहीं होगा.....कैसे..एक मासूम से रिश्ते को बड़े चाव से निगल जाती हैं गलतफहमियां !

Friday, 13 September 2013

समन्दर की बातें !



                
                    
•कल शाम समन्दर से की ढेर सी बातें और ले आई कुछ सौगातें......... हम -दोनों अलग फिर भी एक साथ ---मैं सरसों के रंग में और वो कुछ आकाशी..हलके हरेपन के साथ...

              किनारे खड़े अजनबी सा मैंने देखा उसे के चुपके से उसकी एक लहर ने पाँव में चुटकी काटी के --"आ चल खेलें"...जैसे नई जगह कोई सहृदयी अपना बना ले.......फिर वो अपनी लहरों के साथ उलटे पाँव पीछे लौटा और मैं दौड़ी उसकी ओर..और जैसे ही मैं उसके पाले में घुसी.........उसने घेर लिया मुझे अपनी पूरी मौजों के साथ ..जैसे हम दोनों कबड्डी खेल रहे हों...कई बार उसने मेरे पाँव कसे पर वो लकीर पार कर मैं वापस अपने पाले में थी. अब वो मुझे जान गया था और मैं उसे..तो जरा वो नजदीकियां बढाने लगा .....मैं समझ गयी उसके इरादे...और खेल वहीँ छोड़ के लौट आई किनारे अकेले खेलने....रेत पर अपने पाँव के निशान बनाते मैं आगे बढती रही और वो लहर भर-भर के मिटाता रहा उन्हें......जैसे कह रहा हो...
के--'न खेलब न खेले देब' ...अब वो मुझे चिढ़ा रहा था....मैंने सोचा ये खेलने नहीं देगा अब तो कहीं और चलूँ....तभी याद आया.............अरे.....सू..sssरअज (सूरज).........

                  जब तक दौड़-भाग के पहुंची वो (सूरज) जा चुका था..वहीँ पत्थरों पे बैठ के देखा मैंने उसका आसमान में फैला सिंदूरी रंग....सचमुच जैसे किसी ने सिंदूर से होली खेली हो .....अहा !!
धीरे-धीरे वो रंग भी फीका पड़ने लगा और उतर आया आसमां में षष्ठी का चाँद अधूरा सा......
जिस के इन्तजार में बैठा था समन्दर ठुड्डी पे हथेली टिकाये .............कब से बेचैन......चांदनी उतर कर फैलती रही समंदर के तह तक.....उसके अंतर्मन के किसी एकांत तक .. ..फिर उन्हें....वहीँ छोड़ कर मैं पलटी और देखा........रौशनी से नहाया शहर .......मैं भी लौट आई अपने पूरे चाँद के साथ अपनी छत पर !

जिन्दगी !!!




                            
                                 
          जिन्दगी खुशनुमा सफ़र तलाश करती है..
       काली रातों के आगे सहर तलाश करती है...
कोई मुफलिसी से गुजर न जाए कहीं...
        रोटी के चंद टुकड़े तलाश करती है..
जब टपकता है छप्पर किसी गरीब का..
          उनके लिए महफूज छत तलाश करती है..
जब अजान देता है कोई मस्जिद में..
         वहां अपना खुदा तलाश करती है...
बहुत चेहरे दिए हैं जिन्दगी ने बस
                एक नजर में वफ़ा तलाश करती है.      

Thursday, 12 September 2013

एक प्याली चाय !




 (          
                                   
 
                                                        ( कुछ हल्का-फुल्का रोज के लिए )
       

                          चलो !
                                               
चलो.. चाय बनाते हैं...पानी मैं लाऊंगी..
                                            
तुम लाना हरी पत्तियां बागान से ..
                                               
फिर जरा सी..अदरक की खुशबू मैं घोलुंगी.....
                                            
और तुम डालना ढूध..फिर..रखेंगे..उसे...
                                               
आंच पे..अपनी-अपनी तपिश से दूर...
                                            
न !! तुम नहीं.....मैं डालूंगी शक्कर..
                                             
के तुम ज्यादा कर देते हो... हमेशा..
                                          
फीकी नहीं होनी चाहिए मेरी तुम्हारी मिठास
                                             
कभी भी...किसी भी मिठास के आगे..
                                           
और अब देखो उसकी रंगत.औ खुशबू...
                                             
फिर ले लेना..एक सिप..एक चुस्की...
                                           
चाहे पहले मैं या फिर तुम..
                                             
यूँ ही..बिना कहे सुने भी...जी लेंगे..
                                          
हम दोनों....एक दुसरे का प्यार..
                                           
बस.......एक प्याली..चाय में......बस !

मेरे सारे मौसम तुमसे हैं !


·        
मेरे सारे मौसम तुमसे हैं..
तुम हो तो..आसमान में बादल आते हैं..
बारिशें मन भिगो जाती हैं... ..हवाएं झूम के चलती हैं...
जुल्फ उलझ के गालों को चूम जाती हैं.
इन्द्रधनुष सारे रंग बिखेरता है मुझपे.
मेरे सारे मौसम तुमसे है...
तुम आते हो तो जाड़ो में..
तुम्हारी गर्माहट याद दिलाने
गुनगुनी धूप आती है छत पे..
रात अलाव में सुलगते हैं दोनों के मन.
मेरे सारे मौसम तुमसे है..
तुम आते हो तो आता है..
गर्मियों का अलसाया मौसम...
भोर गौरैया जगा जाती है चहक के..
शाम पुरवाई लाती है तुम्हारी आवाज
रात तारों के शामियाने तले
जब मैं सो जाती हूँ अपनी चादर में लिपटी हुई.
तो आती है मेरे बदन से तुम्हारी खुशबु
मेरे सारे मौसम तुमसे हैं....
तुम हो जाते हो उदास तो ...सारे मौसम उदास..
मेरा घर..मेरा आँगन..मेरी छत उदास...
मेरा मन ..मेरा वजूद उदास...
क्यूंकि मेरे सारे मौसम तुमसे हैं.

बजरा




 
शाम ढले सितारों जड़े आसमां के तले
एक बजरा नदी की लहरों पे हिलोरें लेता हुआ...
दो जिस्म महकते से..बजरे के भीतर पर्दों के ओट में..
बजरे के रोशनदान से चाँद झांकता ..मुस्कुराता हुआ सा..
झील के लहरों पे बलखाता हुआ..गुजरता हुआ....बजरा..
और बजरे के भीतर दो सुलगते हुए दिल...प्यार से लबरेज..
चांदनी से भीगे,सफ़ेद,नर्म बर्फ की चादरों में लिपटे पहाड़..
और जाफरान के खेतों से गुजरता हुआ बजरा..बंजारा सा..
सब मूक देखते रहे दो आत्माओं का घुलना एक-दुसरे में..

इतने ही गवाह थे -शाम,सितारे,आसमां,चाँद,झील,पहाड़,जाफरानी खेत और बजरा !